आखिर क्या और क्यों होती प्लूरिसी - डॉ.डी.एस.संधु

आखिर क्या और क्यों होती है प्लूरिसी - डॉ.डी.एस.संधु

 

अशोकनगर:- कल मेरे पास मेरे पुराने परिचित ने परेशानी के हालात में अंजान नंबर से कॉल किया।कौन पूछने पर उधर से आवाज आई डॉक्टर साहब मैं अरविंद हूँ और इस समय यहाँ भोपाल अपने बड़े भाई को लेकर डीआईजी बंगले के पास नेहरू अस्पताल में खड़ा हूँ इनके दांयी तरफ के सीने और पसलियों में बहुत तकलीफ है।यहां के डॉक्टर बोल रहे हैं इनकी जॉच करने और रिपोर्ट आने में तीन चार दिन लगेंगे। तखलीफ अधिक है,बतायें हम क्या करें जाँच में समय लग रहा है। फिर अरविंद की सारी बातें सुनकर मैंने यही सलाह दी कि जब तुम इन्हें लेकर भोपाल में पहुंच ही गये हो तो उचित भी यही होगा कि तुम मरीज के हित में जो भी आवश्यक परीक्षण हों वह करा ही लो। उन्होंने अपने भाई का भोपाल के ही किसी अन्य चिकित्सालय की जानकारी जुटाकर जो भी जरूरी जाँचें थी,वो करा ली।आज फिर अरविंद से मुलाकात हुई और वह मुझे अपने साथ भाई को दिखाने ले गया।जहां मरीज की तमाम मेडिकल हिस्ट्री का अवलोकन सुनने -करने के उपरांत उन्हें समझाते हुए हिम्मत से काम लेने की सलाह देते हुए बतलाया कि घबराने की कोई बात नहीं है।तुम्हारे भाई को प्लूरिसी नाम की फेफड़ों से संबंधित तकलीफ है। जो इनकी दांयी तरफ की पसलियों में चोट लगने के कारण से यह हो गई है।जिसके चलते सीने में तेज दर्द होता है और सांस लेने तथा छोड़ने पर यह दर्द और अधिक बढ़ जाता है। यह फेफड़ों को सुरक्षित रखने वाली ऊतकों की परत को प्रभावित करती है जिससे परेशानी बढ़ जाती है। प्लूरिसी के लक्षण:-प्लूरिसी का मुख्य लक्षण है छाती में तेज दर्द या लगातार दर्द। दर्द सीने के एक तरफ या दोनों तरफ हो सकता है। साथ ही साथ सांस लेने में यह बढ़ जाता है। इसमें अन्य लक्षण भी देखने में आते हैं,सांस का उखड़ना अथवा तेजी से सांस लेना,खांसना,बिना किसी उचित कारण के शरीर का भार कम होना,हृदय गति तेज होना,प्लूरिसी सामान्य रुप से वायरल इंफेक्शन के कारण होती है। ऐसे में इसके लक्षणों में यह तकलीफें भी देखने में आती हैं:-सिर मे दर्द,जोड़ों में दर्द,गले में खराश,बुखार, ठंड लगना, मांसपेशियों में दर्द का बने रहना।प्लूरिसी का निदान:-प्लूरिसी का निदान करने के लिए चिकित्सक रोगी का चिकित्सा इतिहास( मेडिकल हिस्ट्री) पूछते हुए भौतिक परीक्षण(फिजिकल एग्जामिनेशन) करते हुए। प्लूसिरी के सही और उचित कारणों को जानने के लिए चिकित्सक कुछ पैथोलॉजी से टेस्ट कराने की सलाह देसकते हैं।जैसे कि- रक्त परीक्षण(ब्लड टेस्ट)- किसी तरह का इंफेक्शन तो नहीं है, यह पता करने के लिए ब्लड टेस्ट कराया जाता है। इसके अतिरिक्त ऑटोइम्यून डिसऑर्डर तथा रूमेटाइट आर्थराइटिस और ल्यूपस आदि की जानकारी भी रक्त परीक्षण से ज्ञात हो पाती है।सीने(चेस्ट )का एक्स-रे- छाती के एक्स-रे से पता चलता है कि रोगी के फेफड़ों की क्या स्थिति है।क्या फेफड़े पूरी तरह से फूले हुए हैं या फेफड़े और पसलियों के बीच में फंसा कुछ तरल पदार्थ है। सीटी स्कैन- छाती(चेस्ट) की पूरी तरह से तस्वीर(डिटेल इमेज)जानने के लिए सीटी स्कैन किया जाता है, जिससे प्लूरा की सही स्थिति(कंडिशन)एवं दर्द के कारणों का ठीक तरह पता लगाया जा सके। यदि फेफड़ों में रक्त(ब्लड) जमा है तो सीटी स्कैन से इसका पता चल जाये। अल्ट्रासाउंड- हाई फ्रिक्वेंसी साउंड वेव्स की सहायता से शरीर की आंतरिक सरंचना की फोटो(इमेज) निकाली जाती है, ताकि इसकी उचित सहायता से ज्ञात हो कि रोगी को दर्द का कारण कहीं प्लूरल इफ्यूजन तो नहीं है।बायोप्सी-चिकित्सक प्लूरिसी के कारणों का पता लगाने के लिए प्लूरल बायोप्सी की भी सलाह देते हैं। इस प्रक्रिया में सीने की त्वचा पर छोटा सा चीरालगाकर सुई अंदर डाली जाती है ,तथा प्लूरा से ऊतक का नमूना निकालकर जांच के लिए लेब में भेजा जाता है।प्लूरिसी के जोखिम-प्लूरिसी से जुड़े कुछ जोखिम गंभीर भी हो सकते हैं।जिन्हें कुछ इस जाना जा सकता है-फेफड़ों का अवरुद्ध होनाअथवा उचित रुप में इनका नहीं फूलना ,जितना कि फूलना चाहिए,प्लूरल कैविटी में पीप(पस)भरना,अचानक रक्त प्रवाह कम होना,संक्रमण (सेप्सिस) से गंभीर रिएक्शन,सूजन के कारण भी प्लूरल कैविटी में तरल पदार्थ जमा हो जाता है, जिसको प्लूरल इफ्यूजन कहा जाता है। इस स्थिति में दर्द भले ही कम हो, किन्तु रोगी के लिए सांस लेना मुश्किल हो जाता है। डॉक्टर आपको ड्यूरेटिक्स जैसी दवा दे सकता है या प्रक्रिया के तहत तरल पदार्थ को निकालता है।प्लूरिसी का उपचार:- चिकित्सक प्लूरिसी का उपचार करने से पूर्व उसके उचित कारणों का पता लगाता है, क्योंकि कारण जानने के उपरांत ही रोगी का सही से उपचार किया जा सके। प्लूरिसी का कारण यदि बैक्टीरिया हैं, तो उसे एंटीबायोटिक्स देकर ठीक किया जाता है।यदि फंगस के कारण प्लूरिसी है तो रोगी को एंटीफंगल दवा दी जा सके।प्लूरिसी वायरस के कारण यदि हुई है तो कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाती हैं।प्लूरिसी से पीड़ित कुछ व्यक्तियों के प्लूरा की दोनों लेयर के बीच बहुत अधिक तरल पदार्थ जमा हो जाता है। ऐसी स्थिति में चिकित्सक थोड़ा सा तरल निकालता है।तथा वह प्लूरा के बीच की थोड़ी सी जगह में सुई डालकर ऐसा करते हुए तरल निकालने का प्रयास करता है।चिकित्सक द्वारा रोगी के दर्द हटाने के लिए दर्द निवारक( पेनकिलर) एवं स्टेरॉयड दवाओं को दिया जाता है।ऐसे ही यदि खांसी बहुत अधिक आ रही है, जिससे दर्द बढ़ता है तो खांसी कम करने की दवा भी चिकित्सक देता है।रोगी को जिस तरफ दर्द हो रहा है,उसी तरफ सोने पर उसको दर्द से थोड़ी राहत मिलने पर जैसे ही दर्द कम हो जाए तब रोगी अधिक तथा गहरी सांस लें।सावधानियां:- हमेशा रोगी एवं उसके अटेंडर्स को यह अच्छे से समझते हुये याद रखना अत्यंत आवश्यक है कि इस स्थिति में धूम्रपान(स्मोकिंग)तथा एल्कोहल वाली चीजें मदरा आदि का सेवन बिल्कुल न करें, इन के उपभोग करने से फेफड़ों में इरिटेशन होने से जान जोखिम का अंदेशा हो सकता है ।