देश के इकलौते पांच सितारों वाली रैंक एवं 'उत्कृष्ट नेतृत्व'के धनी मार्शल अर्जन सिंह का निधन!

नई दिल्ली: भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 के दौरान भारतीय वायुसेना का नेतृत्व करने वाले मार्शल अर्जन सिंह का शनिवार शाम निधन हो गया। वह 98 वर्ष के थे। अर्जन सिंह देश के इकलौते ऐसे वायुसेना अधिकारी थे, जो पदोन्नत होकर पांच सितारों वाली रैंक तक पहुंचे थे। यह रैंक थलसेना के फील्ड मार्शल के बराबर होती है। उन्हें शनिवार सुबह दिल का दौरा पड़ने पर सेना के रिसर्च एंड रेफरल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था।वायुसेना घंटे में हमले के लिए तैयार :-पाकिस्तान ने सितंबर 1965 में ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम के तहत भारत पर हमला बोल दिया था। अखनूर जैसे अहम शहर को निशाना बनाया गया। उस समय रक्षा मंत्री ने वायुसेना प्रमुख रहे अर्जन सिंह को अपने दफ्तर में बुलाया और एयर सपोर्ट मांगा। अर्जन सिंह से पूछा गया कि वायुसेना को तैयारी में कितना समय लगेगा। अर्जन सिंह का जवाब था- एक घंटा.. और उसी के अनुसार वायुसेना ने एक घंटे के अंदर पाकिस्तान पर हमला बोल दिया।फ्लाई पास्ट का नेतृत्व :-भारतीय सैन्य इतिहास के मार्शल अर्जन सिंह ऐसे सितारे थे, जिन्होंने 1965 के भारत--पाकिस्तान युद्ध में सिर्फ 44 वर्ष की उम्र में अनुभवहीन भारतीय वायुसेना का नेतृत्व किया था। यही नहीं, देश को आजादी मिलने के बाद 15 अगस्त, 1947 को लालकिले के ऊपर सौ से भी अधिक वायुसेना विमानों के फ्लाइपास्ट का नेतृत्व करने का गौरव भी उन्हें प्राप्त था। उन्हें एक अगस्त, 1964 को चीफ ऑफ एयर स्टाफ (सीएएस) नियुक्त किया गया था। वह ऐसे पहले सीएएस थे, जिन्होंने वायुसेना प्रमुख बनने तक अपनी फ्लाइंग कैटेगरी को बरकरार रखा।मार्शल रैंक की प्रदान :-वायुसेना से 1969 में सेवानिवृत्त होने के पश्चात उन्हें 1971 में स्विट्जरलैंड में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया। इसके बाद 1974 में केन्या में भारतीय उच्चायुक्त नियुक्त किए गए। 1989 में दिल्ली के उपराज्यपाल भी बने। 2002 में उनकी सेवाओं के लिए उन्हें मार्शल की रैंक प्रदान की गई। युद्ध में कुशल नेतृत्व के लिए उन्हें पद्म विभूषण से भी नवाजा गया था।मार्शल का लयालपुर में हुआ था जन्म:-अर्जन सिंह का जन्म 15 अप्रैल, 1919 को अविभाजित भारत के लयालपुर, पंजाब में हुआ था। लयालपुर इस समय पाकिस्तान के फैसलाबाद में है। उनका परिवार सैन्य सेवा में था।'उत्कृष्ट नेतृत्व'के धनी :- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और तीनों सेनाध्यक्ष उनका हालचाल जानने अस्पताल भी पहुंचे थे।;1938 में 19 साल की उम्र में ब्रिटिश सेना के आरएएफ कॉलेज क्रॉनवेल में दाखिला लिया। 1939 में अंबाला में स्क्वाड्रन 1 में पायलट ऑफिसर बने।1944 में भारतीय वायुसेना की नंबर 1 स्क्वाड्रन के नेतृत्वकर्ता के रूप में जापानियों के खिलाफ अराकन अभियान में हिस्सा लिया। उन्हें ब्रिटिश वायुसेना के अहम पुरस्कार डिस्टिंग्विश्ड फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी) से नवाजा गया। उन्हें स्क्वाड्रन लीडर बनाया गया। आजादी के तुरंत बाद उन्हें ग्रुप कैप्टन, अंबाला बनाया गया। 1962 के युद्ध के बाद उन्हें डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ बनाया गया। 1963 में वाइस चीफ बने। एक अगस्त, 1964 को सिंह को चीफ ऑफ एयर स्टाफ बनाया गया। 1969 में तीन दशक वायुसेना में सेवा देने के बाद रिटायर हुए।सिंह ने 60 विभिन्न विमान उड़ाए। 2002 में उन्हें मार्शल की रैंक प्रदान की गई।1949 में एयर कमोडोर की रैंक पर प्रमोट होने के बाद उन्होंने ऑपरेशनल कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिग (एओसी) की जिम्मेदारी संभाली। बाद में इसे ही वेस्टर्न एयर कमांड कहा गया। उन्होंने ऑपरेशन बेस में एओसी के रूप में सबसे लंबा कार्यकाल भी पूरा किया। 1949-52 और 1957-61 तक।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर दुख जताते हुए कहा है कि देश उस लड़ाई में उनके 'उत्कृष्ट नेतृत्व' को कभी नहीं भूलेगा। मोदी ने ट्वीट किया, 'कुछ दिन पहले मैं उनसे मिला था। खराब सेहत के बावजूद उन्होंने मेरे मना करने के बाद भी सैल्यूट करने की कोशिश की। इस तरह का उनका अनुशासन था।'