गांधी चिकित्सा महाविद्यालय की स्नातकोत्तर मान्यता पर मंडराता खतरा!

भोपाल : मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित इकलौता शासकीय गाँधी चिकित्सा महाविद्यालय 13अगस्त 1955 में अपने आरम्भ से यह चिकित्सा  शिक्षा के क्षेत्र में जाना और माना जाता है।जिससे निकले तमाम चिकित्सक देश –विदेश में सफलता पूर्वक अपने चिकित्सा कर्म में लगे मानव सेवा कर रहे हैं।किन्तु यह प्रदेश का प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज अपनी अव्यवस्थाओं से जूझता हुआ,ऐसे भावी डॉक्टर तथा विशेषज्ञ तैयार कर है।जिनका आगे चलकर क्या भविष्य होगा शायद ही इसके प्रबंधन को इसकी तनिक भी चिंता हो!ऐसा इसलिए लग रहा है कि  इस विख्यात गांधी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर तैयार हो रहे हैं, उन्हें प्रैक्टिकल नॉलेज पर्याप्त रूप से नहीं मिल रही है। इसका उदाहरण है रेडियोथैरेपी विभाग। यहां कैंसर की सिकाई के लिए लीनियर एक्सीलरेटर तक नहीं और ब्रैकी थैरेपी मशीन बंद होने के कारण से स्नातकोत्तर छात्रों को थीसिस के लिए जवाहर लाल नेहरू कैंसर अस्पताल जाना पड़ रहा है।मान लीजिये की वहां थीसिस तो वो किसी प्रकार पूरी कर लेंगे,मगर प्रश्न अकेली थीसिस का नही क्या वो अच्छे रेडियोथैरेपिस्ट बन सकेंगे?यह भी एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है ! पीजी की हो सकती मान्यता ख़त्म :-आपको जानकर हैरत होगी कि राजधानी के इस गाँधी चिकित्सा महाविद्यालय को 5 वर्ष पूर्व पीजी की चार सीटों के लिए कॉलेज को एमसीआई ने मान्यता दी थी। पांच वर्ष पूर्ण होने पर फिर से एमसीआई की टीम यहाँ आकर कॉलेज की व्यवस्थाओं का निरीक्षण करेगी। इस दौरान लीनियर एक्सीलरेटर और ब्रैकी थैरेपी बंद मिली तो इन सीटों की मान्यता भी खत्म हो सकती है। शासन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पीपीपी पर लीनियर एक्सीलरेटर लगाने की तैयारी कर रहे है। इसके लिए एजेंसी अभी तय की जानी है। इसके पश्चात् मशीन लगाने और उसके लिए बंकर बनाने में लगभग एक वर्ष का समय लग सकता है। आधुनिक मशीनों का अभाव ,कबाड़ हो चुकी मशीनों से हो रहा केंसर का इलाज:-लीनियर एक्सीलरेटर से कैंसर की सिकाई की जाती है। यह कैंसर की सिकाई की सबसे अत्याधुनिक मशीन है। मशीन नहीं होने से मरीजों को सिकाई के लिए निजी अस्पतालों में जाना पड़ रहा है।ब्रैकी थैरेपी मशीन भी यहां की लगभग 6 माह से बंद है। मशीन से सभी तरह के कैंसर की सिकाई प्रभावित स्थान पर सोर्स के संपर्क के साथ की जाती है। इस मशीन का सोर्स करीब 8 लाख रुपए में आता है जो 6 से 8 महीने तक चलता है। कॉलेज के पास पर्याप्त बजट नहीं होने की वजह से यह सोर्स की खरीदी नहीं हो पा रही है। मशीन बंद होने की वजह से मरीजों को परेशानी हो रही है। साथ ही पीजी छात्र भी कुछ नहीं सीख पा रहे हैं।यहाँ रेडियोथैरेपी में35 वर्ष पुरानी देश की सबसे प्राचीन कोबाल्ट-60 मशीन है। हालत यह है कि मशीन के कल पुर्जे तक नहीं मिल पा रहे हैं। बार-बार मरम्मत कर इसे चलाया जा रहा है। एक-दो महीने के भीतर सोर्स खत्म होने के बाद भी यह मशीन भी हमेशा के लिए बंद हो जाएगी। इस मशीन से हर दिन करीब 30 मरीजों की कैंसर की सिकाई की जा रही है।इसी तरह से ब्रैकी थैरेपी मशीन भी यहां की लगभग महीने से बंद पड़ी है। मशीन से सभी तरह के कैंसर की सिकाई प्रभावित स्थान पर सोर्स के संपर्क के साथ की जाती है। इस मशीन का सोर्स करीब 8 लाख रुपए में आता है जो 6 से 8 महीने तक चलता है।डॉ. अरुणा कुमार, डीन, जीएमसी भोपाल का कहना है कि लीनियर एक्सीलेटर लगाने के लिए स्थान चिन्हित कर लिया है।शासन पीपीपी मोड पर मशीन लगवा रही है।रीवा में ब्रेकी मशीन बंद डाली है।अतः वहां का सोर्स भोपाल की ब्रेकी के उपयोग करने के लिए शासन के आदेश भी हो गए हैं।बजट की समस्या बनी परेशानी का कारण:- कॉलेज के पास पर्याप्त बजट नहीं होने से सोर्स की खरीदी नहीं हो पा रही है। मशीन बंद होने के कारण मरीजों को परेशानी हो रही है। वहीं पीजी छात्र भी कुछ नहीं सीख पा रहे हैं। इसलिए यहअत्यंत चिंता का विषय है कि यदि समय रहते संबंधित सारी कमियां दूर नहीं की गई तो फिर राजधानी के इस मेडिकल कॉलेज में आगे से केंसर विशेषज्ञ बनना बंद हो जायेगा।​

 
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