शहीदे आजम भगतसिंह कला महोत्सव सफलता से संपन्न !

गुना: स्थानीय मानस भवन में मुखौटा कला मंच ने शहीदे आजम भगत सिंह के जन्मदिन के अवसर पर गुना के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण त्रि -दिवसीय कला महोत्सव का सफलतापूर्वक आयोजन किया। इस कला महोत्सव में विविध कलाओं के कार्यक्रम आयोजित किये गये। जिसमें वक्तव्य कला, शास्त्रीय संगीत,नाटक, गजल,बेले,साहित्यक परिचर्चा,आदि कला के विविध रंग देखने-सुनने को मिले।शास्त्रीय संगीत :- गुना जैसी जगह में संगीत की इस गम्भीर विधा की प्रतियोगिता का आयोजन वह भी 15 -45वर्ष की आयु के लोगों में कराया जाना अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है ।जिसमें सभी प्रतिभागियों ने अपने फन के जौहर प्रस्तुत किये ।शास्त्रीय संगीत को लेकर गुना के इन बच्चों में जो समझ इतनी छोटी उम्र में विकसित हो रही है ,निश्चित ही आने वाला कल गुना को शास्त्रीय संगीत में एक नई पहचान बनने की प्रवल संभावना इंगित हो रही हैं। वक्तव्य कला :- तीनो दिन भगत सिंह के सपनो के भारत पर बहुत सारगर्वित बात वक्तव्य कला प्रतियोगिता में  खी गई। प्रथम दिन :- कार्यक्रम की औपचारिक रूप से शुरुवात डॉ.विष्णु शर्मा ने शहीदे आजम भगतसिंह के चित्र पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्वलित के साथ किया।इसके पश्चात् "भगत सिंह के सपनों का भारत और वर्तमान परिस्थितियां"विषय पर भाषण एवं शास्त्रीय संगीत की प्रतियोगिताएं शुरू की गईं जो अपने निर्धारित समय पर तीनों दिन आयोजित होती रहीं ।वहीं शाम को प्रसिद्ध गजल गायक भाई "दिवाकर मीना" द्वारा बहुत अच्छी ग़ज़लों का देर तक गायन हुआ। द्वितीय दिवस:- सम्राट अशोक का कलिंगा विजय के पश्चात् ह्दय परिवर्तन और विश्व शांति की वकालत करता हुआ बैशाली गुप्ता के निर्देशन में "बेले-अशोक" नृत्य नाटक की सफलतम प्रस्तुति भोपाल से पधारे साथी रंगकर्मियों की टीम ने की। नाटक के अंत में अशोकनगर से पधारे मुख्यातिथी वरिष्ठ निर्देशक एवं साहित्यकार डॉ. दविंदर सिंह संधु ने नाटक की समीक्षा करते हुए कहा कि- बेले नाटक की सबसे प्राचीन वो विधा है जिसमें कोई भी पात्र संवाद नहीं बोलता है सिर्फ अपने हाओ -भाओ से नेपथ्य से बोले जा रहे संवादों पर अभिनय करना होता है ।बेले के मंचन में वस्त्र विन्यास और शरीर संचालित करते हुये संगीत की ध्वनि से तालमेल बैठाना होता है । जो अत्यन्त श्रमसाध्य और कठिन होता है ।इसलिए नाटक की यह प्राचीन एवं दुर्लभ विधा कम ही देखने को मिलती है ।इस बेले प्रस्तुति में सभी रंगकर्मियों का अभिनय एकदम उत्कृष्टता से परिपूर्ण तथा दुनिया को सम्राट अशोक से तथागत बनकर द्वारा दिया गया शांति संदेश को सफलतापूर्वक पहुंचा ने में कामयाब रहा ।इतनी अच्छी प्रस्तुति के लिए इसके निर्देशक , कलाकार तथा आयोजक बधाई के पात्र हैं । तृतीय दिन :- सागर सरहदी का लिखा एवं विष्णु झा द्वारा निर्देशित नाटक "भगतसिंह की वापसी" का मंचन किया गया। शहीद सरदार भगतसिंह के क्रांतिकारी विचारो में नाटक के दर्शक इतने डूबे रहे कि नाटक के दौरान कई बार उपस्थित दर्शकगण इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे। क्रांतिकारी भावनाओ से भरा शानदार नाटक का संगीत मधुर जैन और इंजी.राजेश शर्मा ने बखूबी दिया । वहीं नाटक में डॉ. डी.एस. संधु द्वारा लिखे गीत और उनकी दी हुई धुन को उपस्थित दर्शकों ने भरपूर आनंद लेते हुए गुना में बैठे -बैठे पंजाब की माटी की खुशबू को महसूस किया ।नाटक में जहाँ इसके गीत संगीत ने अपना सशक्त पक्ष रखा वहीं प्रमुख तौर पर इन कलाकारों ने नाटक में अपने जीवंत अभिनय से लोगों का दिल जीतने में सफलता पाई यह हैं -रेणुका बरसैया,सागर सोनी,मधुरजैंन,सुखवीरसिंह,इमरान खान,कृष्णा रघुवंशी, तरुण सूद,देवेन्द्र अहिरवार आदि ।मंच व्यवस्था में मिमोह जैन, अंशुल,घनश्याम आदि रहे । वहीं मुखौटा कला मंच के तमाम साथी अपने -अपने प्रयासों से निरन्तर इस कला महोत्सव के कार्यक्रमों को सफल बनाने में लगे रहे।। कार्यक्रम में कुछ भगत सिंह के नाम को बेचने वाले और अपनी छद्मवेसी के बल पर शहीदे आजम के नाम पर चंदा का धंधा करते हुये राजनीति करनेवालो को छोड़कर वह सभी साहित्यकारों ,रंगकर्मी एवं शहर के सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं संस्थाओ के साथियों ,शहरवासियों ने जो दिल से शहीदे आजम भगत सिंह के प्रति सच्ची श्रद्धा रखते हैं ऐसे सुधीजनों ने भी भोपाल, ग्वालियर और अशोकनगर सहित भर बरसात में शामिल होकर आयोजन को सफल बनाते हुये गुना शहर मे शहीदे आजम भगत सिंह के नाम पर इतना विशाल और भव्य कला महोत्सव का नया इतिहास रच दिया है ।
 
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