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Submitted by Dr DS Sandhu on

 

 

सतलुज फिल्म का दृश्य दिल्ली: आपको शायद मालूम न हो कि पहले इस फ़िल्म का नाम 'पंजाब 95' था जिसे बदलकर 'सतलुज' रखा गया । इसे ज़ी-5 पर 3 जुलाई को रिलीज़ किया गया। लेकिन दो दिन बाद ही 5 जुलाई को फ़िल्म को भारत में ज़ी-5 से हटा दिया गया।

 

यह फ़िल्म पंजाब के मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। दिलजीत दोसांझ ने इस फ़िल्म में खालड़ा का मुख्य किरदार निभाया है।

जसवंत सिंह खालड़ा ने 1980 और 1990 के दशक के अंत में पंजाब में हज़ारों अज्ञात शवों के कथित ग़ैर-क़ानूनी अंतिम संस्कार किए जाने के मामले को उजागर किया था जिनके पीछे पंजाब पुलिस का हाथ था।
इसके बाद 1995 में जसवंत सिंह खालड़ा ख़ुद भी रहस्यमय हालात में लापता हो गए थे। उनके लापता होने के बाद उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने उनके लिए इंसाफ़ की लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और दोषियों को सज़ाएँ दिलवाई थीं!
परमजीत कौर ने अदालतों, मानवाधिकार संस्थाओं और सार्वजनिक मंचों पर इस मामले को लगातार उठाया.

उनकी दृढ़ता के कारण ही सीबीआई जाँच हुई। मुकदमा चला और कई पुलिस अधिकारियों को सज़ा हुई।

पंजाब के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में 1980 और 90 का दशक अत्यंत ही दर्दनाक और उथल-पुथल भरा रहा है। 1990 के दशक में पंजाब में कथित ग़ैर-क़ानूनी हत्याओं और लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का मामला जसवंत सिंह खालड़ा ने उजागर किया था।

जसवंत सिंह खालड़ा के 1995 में लापता होने के बाद परमजीत कौर खालड़ा ने इंसाफ़ के लिए लंबी कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ी।

खालड़ा मिशन कमेटी के चेयरमैन बलविंदर सिंह झबाल ने बीबीसी पंजाबी से बातचीत करते हुए बताया कि जब जसवंत सिंह खालड़ा लापता हुए, तो उनके मिशन को आगे बढ़ाने में परमजीत कौर खालड़ा की भी काफ़ी भूमिका रही।
जब 6 सितंबर 1995 में जसवंत सिंह खालड़ा लापता हो गए, तो केस सुप्रीम कोर्ट में चला गया था. दो मामले चल रहे थे। एक लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का और दूसरा जसवंत खालड़ा के लापता होने का।

फिर परमजीत कौर ने मिशन में दिलचस्पी दिखानी शुरू की और मामलों की सुनवाई के दौरान या गवाही के लिए परमजीत कौर अदालत जाने लगीं।

जसवंत खालड़ा की तलाश के लिए परमजीत कौर ने काफ़ी संघर्ष किया, जहाँ से भी जसवंत सिंह के बारे में ख़बर मिलती, तो खालड़ा मिशन की टीम के साथ परमजीत कौर खालड़ा भी जाती थीं।

 

जसवंत सिंह खालड़ा को 6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क स्थित रिहायशी घर से अगवा किया गया था।
6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा लापता हो गए थे। 8 सितंबर 1995 को उनके लापता होने का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस मामले की जाँच सौंपी।

1999 से 2000 के बीच सीबीआई ने जाँच पूरी करके चार्जशीट दायर की। इसके बाद मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई।

खालड़ा मिशन परमजीत कौर ने ख़ुद इस मामले की पैरवी की थी। इस दौरान परमजीत और खालड़ा मिशन की टीम को कई चुनौतियों से गुज़रना पड़ा।

जब बीबी खालड़ा मामले की सुनवाई के लिए जाती थीं, तो उनकी गाड़ी के टायर पंक्चर कर दिये जाते थे। इस तरह तमाम मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा।

खालड़ा मिशन ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष हरमनदीप सिंह के ऊपर भी जसवंत सिंह खालड़ा अपहरण मामले के कारण कई तरह के दबाव डालने की कोशिशें की गई। लेकिन परमजीत कौर ने तब तक हार नहीं मानी, जब तक मुलज़िमों को सज़ा नहीं हो गई।
इस मामले की सख़्त पैरवी और गवाहों के कारण साल 2005 में सीबीआई अदालत, पटियाला हाउस कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुनाया और मुलज़िमों को सज़ा दी।

चुनाव लड़ने का मक़सद:-
जसवंत सिंह खालड़ा जब राज्य की पुलिस खालड़ा को तलाशने में नाकाम रही तो अदालत ने जाँच सीबीआई को सौंप दी।
परमजीत कौर ने अगस्त 1999 में अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया। इस्तीफ़े के बाद परमजीत कौर खालड़ा ने 1999 का लोकसभा चुनाव तरनतारन सीट से लड़ा था।

उन्होंने यह चुनाव सरब हिंद शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार के रूप में लड़ा था। यह पार्टी गुरचरण सिंह टोहड़ा ने बनाई थी। इस चुनाव में परमजीत कौर खालड़ा को जीत नहीं मिली।

सूत्रों ने बताया कि परमजीत कौर खालड़ा का चुनाव लड़ने का मुख्य उद्देश्य सिर्फ़ संसद में जाना नहीं था, बल्कि अपने पति जसवंत सिंह खालड़ा के उठाए गए मानवाधिकारों के मुद्दों और पंजाब में कथित ग़ैर-क़ानूनी हत्याओं और लापता हुए लोगों के मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना था।

यही कारण था कि बाद में 2019 में भी उन्होंने खडूर साहिब लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि, तब भी वह लोकसभा जाने में कामयाब नहीं हो पाईं।
2019 में परमजीत कौर खालड़ा ने पंजाबी एकता पार्टी के टिकट से खडूर साहिब से चुनाव लड़ा था। लेकिन वह यह चुनाव नहीं जीत सकीं।

जब 2019 में एक चर्चा के दौरान मीडिया से बातचीत के करते हुए परमजीत कौर खालड़ा ने कहा था कि उनका मक़सद मानवाधिकारों के मुद्दे को लोगों तक पहुँचाना था।

परमजीत कौर ने दावा किया था कि पूरे भारत में लोगों के लापता होने के मामले देखने को मिलते हैं। यह सिर्फ़ पंजाब में ही नहीं, बल्कि जम्मू- कश्मीर, मणिपुर और तमिलनाडु में भी अल्पसंख्यकों के साथ हो रहा है।

उस समय उन्होंने कहा था कि पंजाब में मुद्दों पर चुनाव नहीं लड़े जाते। यानी मुद्दों की राजनीति नहीं हो रही है। उन्होंने किसानों के मुद्दों जैसे कर्ज़ माफ़ी, युवाओं में बेरोज़गारी और नशे के मुद्दों को भी चुनावों में उठाने की बात कही थी।

हालांकि, खालड़ा मिशन कमेटी ने दावा किया है कि परमजीत कौर खालड़ा अब कोई भी चुनाव नहीं लड़ेंगी। लेकिन यह सब हालात पर निर्भर करेगा कि चुनाव में क्या करना है , अगर परिस्थितियाँ बनीं, तो परमजीत कौर खालड़ा को वापस चुनाव मैदान में उतारा भी जा सकता है।

उन्होंने 2024 में अमृतपाल सिंह संधु (जल्लुपुर खेड़ा) के लिए चुनाव प्रचार किया था। इस दौरान वह रोड शो, रैलियों और घर-घर जाकर वोट माँगते हुए नज़र आई थीं.

अमृतपाल सिंह संधु ने खडूर साहिब सीट से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार भारी जीत हासिल की थी।

नौकरी के साथ-साथ जसवंत का पता लगाने के लिए घर आने वाले रिश्तेदारों और अन्य लोगों का ख़याल अकेली परमजीत कौर ही रखती थीं!