
अशोकनगर:(रिपोर्टिंग,नसीरखान): बुधवार को जिला मुख्यालय पर आरक्षण व्यवस्था बदलने की मांग तथा यूजीसी के विरोध को लेकर सवर्ण समाज के लोगों ने शहर में जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने आरक्षण व्यवस्था का आधार आर्थिक स्थिति को बनाए जाने की मांग को लेकर दिनभर विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन किया।
कलेक्ट्रेट का घेराव : आंदोलन कारियों ने प्रदर्शन के दौरान पहले धरना दिया गया। पश्चात् इन्होंने कलेक्ट्रेट पहुंच के घेराव करते हुए अपनी मांगों की आवाज बुलंद की।
आंदोलनकारियों ने किया चक्का जाम वहीं ईसागढ़ रोड़ के राजमाता चौराहा पर चक्काजाम कर विरोध दर्ज कराया गया। शहर में दिनभर गतिविधियां बनी रहीं।आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग:
प्रदर्शनकारियों का कहना यह था कि आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है। उन्होंने आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति को बनाए जाने की मांग की। उनका कहना था कि उनकी मांगों को शासन स्तर तक पहुंचाया जाए, ताकि इस दिशा में आवश्यक निर्णय लिया जा सके। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन के समक्ष अपनी मांगों को प्रमुखता से रखा और कहा कि शासन तक उनकी बात पहुंचाकर उचित कार्रवाई की जाए।
कलेक्टर मालवीय ने लिया ज्ञापन :शाम 6 बजे कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन
दिनभर चले प्रदर्शन और विभिन्न गतिविधियों के बाद शाम करीब 6 बजे कलेक्टर साकेत मालवीय ने प्रदर्शनकारियों से ज्ञापन प्राप्त किया। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन के माध्यम से अपनी मांगों को शासन तक पहुंचाने की मांग रखी।
ज्ञापन सौंपे जाने के उपरांत प्रदर्शनकारियों ने यह मंशा रही कि शासन उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करेगा और आरक्षण व्यवस्था में आवश्यक बदलाव को लेकर उचित कदम उठाए जाएंगे।
आरक्षण का विरोध दसकों पहले भी हुआ: डॉ.डी.एस.संधु
यह सब आपको अवगत कराना मैं अपना जरूरी दायित्व
समझता हूं कि जब आरक्षण अवधि समाप्त हो रही थी,तब ही सन् 1989-1990 में वी.पी.सिंह प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार ने मंडल- कमंडल के द्वारा एससी,एसटी तो क्या ओबीसी नामक एक नई आरक्षित श्रेणी थोप दी। तथा फिर से आरक्षण का जिन्न खड़ा कर दिया। जिसके विरोध में सारे देश के साथ साथ अशोकनगर जो गुना जिले की बड़ी तहसील हुआ करती थी। यहां के छात्रों - युवाओं ने भी बढ़ चढ़कर आंदोलन किया। कितने ही जगह के प्रदर्शनकारियों ने आत्मदाह कर अपनी जीवन लीला असमय समाप्त करली।
अब फिर से देश को जातियों के वर्ग भेद में उलझाकर इसकी युवा शक्ति के लिए वास्तविक समस्याओं से परे यह जिन्न यूजीसी का रुप लिए आ धमाका है। ताकि इसके आकाओं की कुर्सियां सलामत रहे।
आरक्षण कितना उचित: देश में संविधान लागू होने के पश्चात यह आरक्षण जिन लोगों के मानवीय सरोकारों, उनको मूलभूत सुविधाओं के मूल्यांकन और शिक्षा स्वास्थ्य एवं रोजगार तथा देश के राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी सक्रियता के साथ भागीदारी करने का जो आरक्षण के रुप में अधिकार संविधान ने प्रदान किया यह बहुत अच्छी तथा मानवता वाली सोच थी । निश्चित ही इसकी प्रशंसा होनी चाहिए और समय समय पर होती भी रही है।
फिर ऐसी क्या बात या कमी रही कि इसका लाभ पूरी तरह से उन लोगों को नहीं मिल सका, जो वास्तविक रूप में इसके हकदार हैं। इसके लिए दोषी कौन है...! छोटी सी लापरवाही के लिए जब शासकीय कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस थमाते हुए कभी निलंबित तो कभी सेवा से मुक्त तक कर दिया जाता है। फिर यह कोई छोटी मोटी गलती नहीं है कि क्यों नहीं मिला इन वास्तविक और पात्रता वालों को पूरी तरह आरक्षण का लाभ !
उत्तर सीधा सरल है : धन के लालचियों द्वारा अपने दायित्वों और अधिकारों को सक्षम और रसूखदारों के हाथों में मोटी मोटी रकमें लेकर आरक्षण के अधिकार का दुरुपयोग करते हुए आरक्षण पत्र बनाकर देना । ऐसे कितने ही प्रमाण आपको देखने मिल जायेंगे।
जब इतने महत्वपूर्ण दस्तावेज शासकीय स्तर पर मोटी सुविधा शुल्क से अपात्रों को मिल जाते हैं। तब आर्थिक रुप से निर्धनता का प्रमाण पत्र बनना कोई बड़ी बात नहीं है। यहीं अशोकनगर में कितने अपात्रों के बीपीएल कार्डधारकों के मामले सामने आए थे।
शहर में ऐसे कितने ही बहुमंजिला भवनों के बाहर लिखा देखा ही होगा "यह परिवार गरीबी रेखा , तथा अत्यंत गरीबी रेखा के नीचे है"!
इसका सीधा तात्पर्य यह है कि अवसरवादी लौभी लालचियों की भरमार समाज में कूट-कूट कर भरी हुई है। कि कैसे भी हो हमें लाभ होना चाहिए। फिर चाहे किसी भी नियमों का उलंघन क्यों न हो।जो लोग अक्सर बहुत लंबी लंबी सिद्धांतों की देते हैं उन्हें भी मौका मिलते अपने हाथ साफ करते देखा जा सकता है।
जब तक अशोकनगर सहित सारे देश के लोग स्वार्थी और लालचीपन से अपने आप को पूरी तरह दूर नहीं करेंगे, तथा जात-पात, ऊंच-नीच,क्षेत्रवाद धार्मिक कट्टरवाद का त्याग नहीं करते तथा मानवीय समानताएं नहीं अपनाते हैं। तथा शिक्षित नहीं होंगे, तब तक राजनैतिक समझ विकसित नहीं हो सकती है। और बिना सही समझ के आरक्षण का लाभ पात्रों की अपेक्षा अपात्रों को ही अधिक मिलता रहेगा। परिणाम वहीं जो सिलसिला हमेशा से चला आ रहा है । आरक्षण के पक्ष और विरोध में आंदोलन -प्रदर्शन जो देश हित में कतई उचित नहीं कहा जा सकता है!